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Poet's Name stringclasses 61 values | Period stringclasses 40 values | Language stringclasses 3 values | Additional Info stringclasses 16 values | Poem Text stringlengths 66 168k ⌀ |
|---|---|---|---|---|
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा हरि सो गुरु बिना, होत न सबद विवेक।
ज्ञान रहित अज्ञान सुत, कठिन कुमन की टेक॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | उग्यो बिरहा जिण हिवरे, रोमां माइन राम।
चातक ज्यूं पी नै रटै, पीपा आठहुँ धाम॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा भज श्रीराम को, परिहर अखिल विचार।
आजस तज या मनुज तनु, क्यों गिरता संसार॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | साँचा साँई परचिया, सतगुरु संत सहार।
पीपा प्रणवै वाहि को, जो सबको करतार॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | राम नाम सुमरत भये, रंक बँक बजरंग।
ध्रुव प्रह्लाद गीधगज, तजकुल को परसंग॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा देर न कीजिये, भज लीजे हरि नाम।
कुण जाणै क्या होवसी, छूट जाएँगे प्रान॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा देख विचार हिय, है यह मतो प्रवीन।
समचित रह संसार में, राम रसायन लीन॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा माया नागणी, मन में धरौ बिसाल।
जिन जिन दूध परोसियो, उण रो करियो नास॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | माला मणका क्या गिनूं, यह तो सुमरण धाम।
पीपा को हरि सुमरै, पीपा सुमरे राम॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | बण्यो बणायो रहे सदा, काटत है नहिं शूल।
अरुण वरुण क्या काम को, बास बिना को फूल॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा मन हरख्यौं फिरै, समझे नहीं गंवार।
राम बिना जाणै नहीं, पावाँ तणा पहार॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | भलौ बुरौ सब एक है, जाके आदि न अंत।
जगहित जो हरि को सैवये, पीपा सोई संत॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | जातां भव मझधार में, आयौ दुख रो अंत।
पीपा गुरु परसाद ते, पायो पिया अनंत॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा गुरु हरि एक है, इणमां भेद न भूल।
जै इण में अंतर करै, तिन के हिरदै सूल॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | भजत दुख मोचन करण, हरण सफल जंजाल।
पीपा क्यों नहिं भजत नर, निस दिन राम कपाल॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | जिणरो रूप न रंग अंग, करण मरण अर जीव।
रंग बास बन ज्यों रमै, अस पीपे को जीव॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा जिनके मन कपट, तन पर ऊजरौ भेस।
तिन को मुख कारौ करो, संत जनां का लेख॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा माया नारी परहरै, चित तूं धरै उतारि।
ते नर गोरखनाथ ज्यूँ, अमर भया संसारि॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा दास कहाबो कठिन है, मन नहिं छांड़े मानि।
सतगुरू सूँ परचौ नही, कलियुग लागौ कानि॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | सतगुरू साँचो जोहरी, परसे ज्ञान कसौट।
पीपा सुधो ई करे, दे अणभौरी चोट॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा थौड़े अंतरै, घणी बिगूती लोई।
महामाई मान्या घणा, तार यौ नाहीं कोई॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा पारस परसताँ, लोहा कंचन होई।
सिद्ध के कांठे बैसताँ, साधक भी सिद्ध होई॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा सिख दे जगत कूं, काठे सब रो बाँक।
पेख्या पलक उघाड़ कै, अपणौ अंतर झाँक॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा मणको काठ रो, बीच पिरोवे सूत।
सुमरणी निरदोषणी, के रण हार कपूत॥ |
संत पीपा | 1359 -1420 | दोहा | null | पीपा परनारी परतखि छुरी, बिरला बंचै कोई।
नाँ पेटि संचारिऐ, सो सेना की होई॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ न कथनी और की, मेरे मन धिक्कार।
रसिकन की गारी भली, यह मेरौ सिंगार॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ बचन मीठे कहै, खरबूजा की भाँति।
ऊपर देखौ एक सौ, भीतर तीन्यों पाँति॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | मुख मीठी बातें कहै, हिरदै निपट कठोर।
व्यास कहौं क्यों पाय हैं, नागर नंदकिसोर॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ मिठाई विप्र की, तामे लागै आगि।
बृंदाबन ते स्वपच की, जूठहि खैए माँगि॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ बड़ाई लोक की, कूकर की पहिचानि।
प्रीति करै मुख चाटही, बैर करै तनु-हानि॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | बृंदावन के स्वपच कौ, सेवक होय।
तासों भेद न कीजिए, पीजै पद-रज धोय॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | श्रीहरि-भक्ति न जानहीं, माया ही सों हेत।
जीवन ह्वैहै पातकी, मरि कै ह्वैहै प्रेत॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | मेरे मन आधार प्रभु, श्रीवृंदावन-चंद।
नितप्रति यह सुमरत रहौं, ‘व्यासहिं’ मन आनंद॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | हरि हीरा गुरु जौहरी, ‘व्यासहिं’ दियौ बताय।
तन मन आनंद सुख मिलै, नाम लेत दुख जाय॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | सती सूरमा संतजन, इन समान नहिं और।
अगम पंथ पै पग धरैं, डिगै न पावै ठौर॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ स्वपच बहु तरि गए, एक नाम लवलीन।
चढ़े नाव अभिमान की, बूड़े कोटि कुलीन॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | मुख मीठी बातैं कहै, हिरदै निपट कठोर।
‘व्यास’ कहौ क्यों पाय है, नागर नंदकिसोर॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ बड़ाई जगत की, कूकर की पहिचानि।
प्यार करे मुख चाटई, बैर करे तन हानि॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | साकत सगो न भेटिये, इंद्र कुबेर समान।
सुंदर गनिका गुन भरी, परसत तनु की हान॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | नारि नागिनी बाघनी, ना कीजै विश्वास।
जो वाकी संगत करै, अंत जु होय बिनास॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ पराई कामिनी, कारी नागिन जान।
सूँघत ही मर जायगो, गरुड़ मंत्र नहिं मान॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | साकत-बामन जिन मिलौ, वैष्णव मिलि चंडाल।
जाहि मिलै सुख पाइये, मनो मिले गोपाल॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ दीनता पारसै, नहिं जानत जग अंध।
दीन भये तैं मिलत है, दीनबंधु से बंध॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ न कथनी काम की, करनी है इकसार।
भक्ति बिना पंडित वृथा, ज्यों खर चंदन भार॥ |
हरीराम व्यास | 1510 -1632 | दोहा | null | ‘व्यास’ कुलीननि कोटि मिलि, पंडित लाख पचीस।
स्वपच भक्त की पानहीं, तुलै न तिनके सीस॥ |
हरिव्यास देव | null | दोहा | null | पूरन प्रेम प्रकास के, परी पयोनिधि पूरि।
जय श्रीराधा रसभरी, स्याम सजीवनमूरि॥ |
हरिव्यास देव | null | दोहा | null | अमृत जस जुग लाल कौ, या बिनु अँचौ न आन।
मो रसना करिबो करो, याही रस को पान॥ |
हरिव्यास देव | null | दोहा | null | निरखि-निरखि संपति सुखै, सहजहि नैन सिराय।
जीवतु हैं बलि जाउँ या, जग माँही जस गाय॥ |
हरिव्यास देव | null | दोहा | null | तिहि समान बड़भाग को, सो सब के शिरमौर।
मन वच, क्रम सर्वद सदा, जिन के जुगलकिशोर॥ |
हरिव्यास देव | null | दोहा | null | शुद्ध, सत्व परईश सो, सिखवत नाना भेद।
निर्गुन, सगुन बखानि के, बरनत जाको बेद॥ |
हरिव्यास देव | null | दोहा | null | बिधि निषेध आदिक जिते, कर्म धर्म तजि तास।
प्रभु के आश्रय आवहीं, सो कहिये निजदास॥ |
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